केलांग-15अक्टूबर. हिमालयी क्षेत्र में आपदा जोखिम को कम करने तथा प्रारंभिक चेतावनी तंत्र को सुदृढ़ करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल के तहत लाहौल-स्पीति जिले की घेपन घाट हिमनद झील में भारत की पहली ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली ( अर्ली वार्निंग सिस्टम ) स्थापित की गई। समुद्र तल से लगभग 4,100 मीटर की ऊंचाई पर स्थित इस झील में स्थापित यह प्रणाली सेंटर फॉर डेवलपमेंट ऑफ एडवांस्ड कंप्यूटिंग (C-DAC) द्वारा विकसित की गई है। यह परियोजना राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण द्वारा वित्तपोषित पायलट परियोजना का हिस्सा है।
उल्लेखनीय है कि घेपन घाट झील के बढ़ते आकार और इससे जुड़े संभावित जोखिमों को देखते हुए जिला प्रशासन द्वारा पहले से ही निगरानी एवं एहतियाती उपायों को सुदृढ़ करने की दिशा में कार्य किया जा रहा है, और उपायुक्त एवं अध्यक्ष जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण किरण भड़ाना लगातार अर्ली मॉर्निंग सिस्टम जल्दी स्थापित करने हेतु राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण से संपर्क में थी ताकि झील के पानी के स्तर की वास्तविक स्थिति के आंकड़े लगातार जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण को मिल सके और झील के पानी के स्तर की लगातार निगरानी रखी जा सके, इस संदर्भ में हाल ही में किरण भड़ाना ने स्वयं घेपन झील का दौरा भी किया था।
नवंबर 2023 में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) द्वारा झील के बढ़ते क्षेत्रफल के संबंध में प्रशासन को अवगत करवाया गया था। इसके बाद झील के संभावित जोखिमों के आकलन, वैज्ञानिक अध्ययन, संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान और आपदा से निपटने की तैयारियों को लेकर विभिन्न स्तरों पर प्रयास किए गए।
इसी क्रम में अब झील पर अत्याधुनिक अर्ली वार्निंग सिस्टम की स्थापना एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। वहीं दूसरी ओर, चंद्रा–चिनाब (चंद्रभागा) नदी क्षेत्र में उच्चतम बाढ़ स्तर (High Flood Level–HFL) के चिह्नांकन का कार्य 100 प्रतिशत पूर्ण कर लिया गया है। ये दोनों जिले में वैज्ञानिक निगरानी, संभावित बाढ़ जोखिम के आकलन, जन-जागरूकता तथा प्रभावी आपदा प्रबंधन व्यवस्था को मजबूत बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं।
घेपन घाट झील में स्थापित प्रणाली में बुआय-आधारित झील निगरानी स्टेशन, स्वचालित मौसम स्टेशन तथा ग्लेशियर विजन यूनिट शामिल हैं। इन उपकरणों के माध्यम से झील और उसके आसपास के पर्यावरणीय परिवर्तनों की निगरानी की जाएगी। प्रणाली से प्राप्त सेंसर डेटा, दृश्य अवलोकनों और कम्प्यूटेशनल मॉडलों को C-DAC के सुपरकंप्यूटर प्लेटफॉर्म के साथ एकीकृत किया जायेगा । इससे प्राप्त सूचनाओं का विश्लेषण कर संबंधित आपदा प्रबंधन प्राधिकरणों को झील की स्थिति और संभावित खतरों के आकलन में सहायता मिलेगी।
इस प्रणाली की प्रमुख विशेषताओं में वास्तविक समय में डेटा का दृश्यांकन, निर्धारित मानकों के आधार पर अलर्ट जारी करना, संभावित GLOF परिदृश्यों का अनुकरण तथा बाढ़ जोखिम का आकलन शामिल है। इससे अधिकारियों को परिस्थितियों की बेहतर समझ विकसित करने, जोखिम का आकलन करने और आपातकालीन तैयारियों को प्रभावी बनाने में सहायता मिलने की उम्मीद है।
इस महत्वपूर्ण परियोजना के क्रियान्वयन में जिला प्रशासन लाहौल-स्पीति और जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने प्रशासनिक स्वीकृतियों, लॉजिस्टिक व्यवस्थाओं तथा फील्ड स्तर पर समन्वय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। हिमाचल प्रदेश राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण , अटल बिहारी वाजपेयी पर्वतारोहण एवं संबद्ध खेल संस्थान , राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल , चिकित्सा एवं पुलिस दलों तथा अन्य सहयोगी एजेंसियों का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा। दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों, कठिन पहाड़ी भूभाग और अप्रत्याशित मौसम के बावजूद विभिन्न एजेंसियों और फील्ड टीमों के समन्वित प्रयासों से इस प्रणाली की स्थापना संभव हो पाई।
घेपन घाट झील से जुड़े संभावित जोखिमों को कम करने के लिए जिला प्रशासन द्वारा प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली के साथ-साथ अन्य एहतियाती उपायों पर भी कार्य किया जा रहा है। इनमें संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान, स्थानीय त्वरित प्रतिक्रिया दलों का गठन, सामुदायिक जागरूकता एवं प्रशिक्षण तथा संभावित बाढ़ के प्रभावों को ध्यान में रखते हुए हाई फ्लड लेवल (HFL) मार्किंग जैसे प्रयास शामिल हैं। इन उपायों का उद्देश्य आपदा की स्थिति में समय रहते चेतावनी, त्वरित प्रतिक्रिया और बचाव एवं राहत कार्यों को प्रभावी बनाना है।
घेपन घाट झील में स्थापित यह प्रणाली हिमालयी क्षेत्र में हिमनद झीलों की निगरानी और आपदा पूर्व तैयारी को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इस पायलट परियोजना से प्राप्त तकनीकी एवं परिचालन अनुभव भविष्य में अन्य संवेदनशील हिमनद झीलों के लिए भी इसी प्रकार की प्रणालियां विकसित करने में उपयोगी साबित हो सकते हैं। वैज्ञानिक निगरानी, आधुनिक तकनीक और विभिन्न एजेंसियों के समन्वय से यह पहल संभावित GLOF जोखिमों के बेहतर आकलन तथा संवेदनशील समुदायों और आधारभूत संरचनाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
