शिमला,29 अक्टूबर. हिमाचल प्रदेश में बिजली नियामक आयोग के अध्यक्ष की नियुक्ति को लेकर राज्य की सुक्खू सरकार को प्रदेश हाईकोर्ट से बड़ा झटका लगा है। प्रदेश हाईकोर्ट ने अध्यक्ष पद की चयन प्रक्रिया रद्द करने के सरकार के फैसले को असंवैधानिक करार देते हुए खारिज कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि जब वैधानिक चयन समिति ने प्रक्रिया पूरी करने के बाद योग्य उम्मीदवारों के नामों की सिफारिश कर दी थी, तो सरकार केवल अपनी पसंद या उम्मीदवारों की वरिष्ठता के आधार पर पूरी चयन प्रक्रिया रद्द नहीं कर सकती।
न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर और न्यायाधीश भूपेश शर्मा की खंडपीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के आदेश के बाद सरकार को चयन समिति की ओर से अनुशंसित पैनल में शामिल पंकज राय और राजीव सूद में से किसी एक के नाम पर विचार कर नियुक्ति प्रक्रिया आगे बढ़ानी होगी।
मामला हिमाचल प्रदेश विद्युत विनियामक आयोग के अध्यक्ष पद की नियुक्ति से जुड़ा है। राज्य सरकार ने अगस्त 2025 में इस पद के लिए आवेदन आमंत्रित किए थे। आवेदन करने वालों में तीन पूर्व मुख्य सचिव प्रबोध सक्सेना (1990 बैच), राम सुभाग सिंह (1987 बैच) और संजय गुप्ता (1988 बैच) जैसे सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी शामिल थे।
चयन के लिए सेवानिवृत्त हाईकोर्ट न्यायाधीश की अध्यक्षता में वैधानिक समिति गठित की गई थी। समिति ने उम्मीदवारों के साक्षात्कार के बाद सर्वसम्मति से आईएएस अधिकारी पंकज राय और राजीव सूद के नामों का पैनल सरकार को भेजा था।
हालांकि, सरकार ने अगले ही दिन इस पैनल को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। सरकार की ओर से कहा गया कि अनुशंसित उम्मीदवार पद के अनुरूप वरिष्ठता और कद नहीं रखते। चयन प्रक्रिया में प्रक्रियागत खामियां होने की बात भी कही गई। इसके बाद 30 सितंबर 2025 को अधिसूचना जारी कर पूरी चयन प्रक्रिया रद्द कर दी गई।
सरकार ने अदालत में दलील दी कि विद्युत नियामक आयोग के अध्यक्ष को बिजली बोर्ड के अध्यक्ष सहित वरिष्ठ अधिकारियों के साथ काम करना होता है। बिजली बोर्ड के अध्यक्ष का पद मुख्य सचिव स्तर का होता है। ऐसे में सरकार के अनुसार, 2014 बैच के अधिकारी की इस पद पर नियुक्ति उपयुक्त नहीं थी।
सरकार ने चयन समिति की कार्यवाही में संभावित हितों के टकराव से संबंधित जानकारी दर्ज नहीं होने का मुद्दा भी उठाया। उसका कहना था कि समिति ने यह स्पष्ट रूप से दर्ज नहीं किया कि उम्मीदवारों का कोई वित्तीय या व्यक्तिगत हित उनके कामकाज को प्रभावित नहीं करेगा।
याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि विद्युत अधिनियम, 2003 के तहत चयन समिति को नियुक्ति के लिए नामों की सिफारिश करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। सरकार समिति के ऊपर अपीलीय प्राधिकरण की तरह काम नहीं कर सकती। याचिकाकर्ता ने यह भी आरोप लगाया कि वरिष्ठ अधिकारियों के चयनित नहीं होने के बाद कनिष्ठता का आधार बनाकर पूरी प्रक्रिया रद्द की गई।
हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलों और कानूनी प्रावधानों पर विचार करने के बाद सरकार के फैसले को खारिज कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि कानून के तहत गठित विशेषज्ञ समिति की सिफारिशों को सरकार केवल अपनी पसंद के उम्मीदवार का चयन नहीं होने या वरिष्ठता के आधार पर मनमाने ढंग से रद्द नहीं कर सकती।
