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शिमला-29 अगस्त. नेपाल में आई प्राकृतिक तबाही के बाद हिमाचल प्रदेश के ग्लेशियर भी डराने लगे हैं। एक हालिया अध्ययन के अनुसार राज्य में ग्लेशियर झीलों की संख्या 1990 में 107 से बढ़कर 2024 में 669 हो गई है। यानी इनकी संख्या में करीब 525 फीसदी की वृद्धि हुई है। इसी अवधि में इन झीलों का कुल क्षेत्रफल 5.54 वर्ग किलोमीटर से बढ़कर 11.20 वर्ग किलोमीटर हो गया। अध्ययन में 94 अपेक्षाकृत बड़ी ग्लेशियर झीलों का अलग से आकलन किया गया, जिनमें 88 को ग्लेशियर झील से अचानक बाढ़ आने यानी GLOF के संभावित कारणों के प्रति संवेदनशील पाया गया। नेपाल में हाल की भीषण बाढ़ के बाद हिमाचल की ग्लेशियर झीलों पर चिंता बढ़ना इसी वजह से महत्वपूर्ण है। ग्लेशियरों के पीछे हटने और बर्फ के पिघलने से कई स्थानों पर पानी जमा होकर झीलों का रूप ले रहा है। वैज्ञानिक अध्ययनों में हिमाचल में ग्लेशियर झीलों के आकार और संख्या में लंबे समय से बदलाव दर्ज किया गया है। हालांकि सभी 669 झीलों को खतरनाक कहना सही नहीं होगा। खतरा झील के आकार, उसकी स्थिति, प्राकृतिक बांध की मजबूती, आसपास के ग्लेशियर और नीचे बसे क्षेत्रों जैसे कई कारकों पर निर्भर करता है। इसी कारण बड़ी और संभावित रूप से संवेदनशील झीलों की अलग से पहचान कर उनका जोखिम आकलन किया जा रहा है। हिमाचल के लिए यह निगरानी इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि कई ग्लेशियर झीलें ऊंचाई वाले ऐसे इलाकों में हैं, जहां किसी अचानक बदलाव का असर नीचे की घाटियों तक तेजी से पहुंच सकता है।
लाहौल-स्पीति की घेपन घाट ग्लेशियर झील इस बदलते परिदृश्य का प्रमुख उदाहरण है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के सैटेलाइट अध्ययन के अनुसार 1989 में इस झील का क्षेत्रफल 36.49 हेक्टेयर था, जो 2022 में बढ़कर 101.30 हेक्टेयर हो गया। इस दौरान झील के क्षेत्रफल में करीब 178 फीसदी की वृद्धि हुई और इसका आकार लगभग तीन गुना हो गया। झील करीब 4,068 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। ISRO के अनुसार इसका क्षेत्रफल औसतन करीब 1.96 हेक्टेयर प्रतिवर्ष की दर से बढ़ा। एक अन्य अध्ययन में 1970 के दशक में झील का क्षेत्रफल करीब 27 हेक्टेयर और 2019 में करीब 99 हेक्टेयर बताया गया है। अलग-अलग अध्ययन अवधि और पद्धति के कारण इन आंकड़ों को उसी संदर्भ में देखना जरूरी है।
घेपन झील को लेकर चिंता उसके संभावित टूटने से होने वाली ग्लेशियर लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) को लेकर है। राष्ट्रीय रिमोट सेंसिंग केंद्र (NRSC) के जोखिम आकलन में झील के नीचे के क्षेत्रों पर संभावित प्रभाव का अध्ययन किया गया है। सबसे खराब स्थिति में बाढ़ की लहर के करीब 21 मिनट में सिस्सू पहुंचने का अनुमान लगाया गया है। आकलन में पानी की गति करीब 43 किलोमीटर प्रति घंटे और बाढ़ की गहराई 20 मीटर तक पहुंचने की स्थिति का अध्ययन किया गया है। संभावित बाढ़ में पानी के साथ चट्टान, पत्थर, बर्फ और मलबा भी नीचे आ सकता है। NRSC के आकलन में 34 बस्तियों, करीब 204 हेक्टेयर कृषि भूमि, 57 पुलों और लगभग 106 किलोमीटर सड़क पर संभावित असर का अध्ययन किया गया है। चिनाब नदी तंत्र से जुड़े होने के कारण संभावित प्रभाव हिमाचल से आगे जम्मू-कश्मीर के क्षेत्रों तक पहुंच सकता है।

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