शिमला-10 अगस्त. केंद्र सरकार के खिलाफ माकपा से जुड़े विभिन्न संगठनों ने विभिन्न मुद्दों पर शिमला के मॉल रोड़ पर सैंकड़ों प्रदर्शनकारी गिरफ्तारियां देने पहुंचे व डेढ़ घंटे तक प्रदर्शन किया परंतु जिला प्रशासन ने कोई गिरफ्तारी नहीं की। रिपोर्टिंग रूम पर प्रदर्शन से पूर्व आंदोलनकारियों ने जैन धर्मशाला शिमला, रिज मैदान व इवनिंग कॉलेज से तीन रैलियां निकालीं। ये रैलियां रिपोर्टिंग रूम में जनसभा में तब्दील हो गईं जहां पर काफी देर तक मोदी सरकार की मजदूर किसान विरोधी नीतियों के खिलाफ नारेबाजी होती रही। प्रशासन के मान मनौव्वल के बाद भी सैंकड़ों प्रदर्शनकारी जेल भरो आंदोलन में डटे रहे।
रिपोर्टिंग रूम पर हुए प्रदर्शन को संबोधित करते हुए सीटू प्रदेशाध्यक्ष विजेंद्र मेहरा, कोषाध्यक्ष जगत राम, सेब उत्पादक संघ प्रदेशाध्यक्ष सोहन सिंह ठाकुर व हिमाचल किसान सभा नेता संदीप वर्मा
ने कहा है कि मोदी सरकार की किसान-विरोधी, मज़दूर-विरोधी और कॉरपोरेटपरस्त नीतियों के खिलाफ अब निर्णायक संघर्ष का समय आ गया है। उन्होंने कहा कि 10 अगस्त का संघर्ष केवल एक दिन का विरोध नहीं है। यह किसानों और मजदूरों के उस बड़े और निरंतर संघर्ष की तैयारी है, जो 26 नवंबर 2026 से देशभर में “खेती बचाओ, उद्योग बचाओ और भारत बचाओ” के नारे के साथ शुरू होगा। यह वही 26 नवंबर है, जब वर्ष 2020 में ऐतिहासिक किसान मजदूर आंदोलन की शुरुआत हुई थी। उस आंदोलन ने देश की किसान-मज़दूर एकता और संघर्ष की ताकत को पूरे देश के सामने साबित किया था। आज फिर उसी एकता और संघर्ष की जरूरत है। उन्होंने कहा कि मजदूर विरोधी चार लेबर कोड बंधुआ मजदूरी व गुलामी प्रथा को बढ़ावा देंगे। इस से 74 प्रतिशत मजदूर श्रम कानून के दायरे से बाहर हो जाएंगे। मुक्त व्यापार समझौतों व भारत अमरीका ट्रेड डील से किसानी व उद्योग संकट में आ जाएंगे। हिमाचल प्रदेश में सेब व अन्य फलों की खेती बर्बाद हो जाएगी। देश में फसलों पर संकट मंडराएगा। कई उद्योग इसकी जद में आएंगे व मजदूरों की छंटनी होगी। आज किसानों को उनकी उपज का कानूनी रूप से गारंटीकृत न्यूनतम समर्थन मूल्य नहीं मिल रहा है, जबकि खेतिहर मजदूर और श्रमिक बढ़ती महंगाई, बेरोजगारी और असुरक्षित रोजगार के बीच सम्मानजनक जीवन जीने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। दूसरी ओर, कॉरपोरेट घरानों को खेती, उद्योग, बिजली और सार्वजनिक संसाधनों पर बढ़ता नियंत्रण दिया जा रहा है।
उन्होंने मांग की है कि मजदूर विरोधी चार लेबर कोड को रद्द किया जाए। सभी मजदूरों के लिए कम से कम 42 हजार रुपए मासिक मजदूरी सुनिश्चित की जाए। मुक्त व्यापार समझौतों को स्वीकार नहीं किया जाए और भारतीय किसानों के हितों की रक्षा की जाए। कॉरपोरेट को खेती से बाहर किया जाए तथा किसानों के जमीन और आजीविका के अधिकारों की रक्षा की जाए। सभी फसलों के लिए C2+50% के आधार पर न्यूनतम समर्थन मूल्य की कानूनी गारंटी और सुनिश्चित सरकारी खरीद का कानून बनाया जाए। मनरेगा को मजबूत एवं पुनर्स्थापित किया जाए; खेतिहर मजदूरों को 200 दिन का काम और 700 रुपए प्रतिदिन मजदूरी दी जाए। किसानों की व्यापक कर्ज़ माफी की जाए तथा आत्महत्या करने वाले किसानों के परिवारों को 25 लाख रुपए का मुआवज़ा दिया जाए। राज्यों के संघीय अधिकारों की रक्षा की जाए और राज्यों के लिए डिविजिबल पूल में हिस्सा 31% से बढ़ाकर 50% किया जाए तथा इसमें सेस और सरचार्ज को भी शामिल किया जाए। बिजली का निजीकरण बंद किया जाए और किसानों व उपभोक्ताओं पर थोपे जा रहे प्री-पेड स्मार्ट मीटर वापस लिए जाएं। सीड बिल, 2025 को लागू न किया जाए और किसानों के बीज अधिकारों की रक्षा की जाए।
